Muharram Shia Muslim - ताजिया पर किस सुल्तान ने रोक लगा दी थी | काले कपड़े पहनना सही है या नहीं | मोहर्रम के दिन क्या पढ़ना चाहिए ?

नमस्कार दोस्तों,


सिया और सुन्नी दोनों ही मुस्लिम संप्रदाय है, इसलिए सुन्नी मुस्लिम संप्रदाय के बाद, इस्लाम धर्म का दूसरा सबसे बड़ा संप्रदाय शिया मुस्लिम को माना जाता है, शिया मुस्लिम लोगों की संख्या पूरी मुस्लिम आबादी का केवल 15% ही है |


Muharram Shia Muslim - ताजिया पर किस सुल्तान ने रोक लगा दी थी
 Muharram Shia Muslim - ताजिया पर किस सुल्तान ने रोक लगा दी थी

हजरत मोहम्मद की मृत्यु के बाद  632 ईस्वी में, पैगंबर मोहम्मद की वसीयत के अनुसार, जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम एवं खलीफा (नेता) चुना था वह लोग शीयाने अली कहलाए गए, इसीलिए आज उन मुसलमानों को सिया मुस्लिम के नाम से जाना जाता है |


धार्मिक मतों के अनुसार, हजरत अली मोहम्मद साहब के चचेरे भाई के साथ-साथ दामाद भी थे, इसलिए हजरत अली ही मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी होने के कारण, उन्हें खलीफा होना चाहिए था, लेकिन बाद में ऐसा नहीं हुआ था, हजरत अली को तीन और लोगों के बाद खलीफा बनाया गया था, लेकिन यह पहले ही होना था, ऐसा ही विश्वास रखने वाले लोग सिया मुस्लिम कहलाए गए |


इस्लाम की तारीख के दिन पूरी दुनिया के मुसलमान के द्वारा, मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का दिन होता है, पैगंबर मोहम्मद साहब के बाद चार खलीफा चुने गए थे, बाद में मुसलमानों द्वारा आपस में तय करके किसी एक योग्य व्यक्ति को, अपनी सुरक्षा एवं प्रशासन आदि की सुरक्षा के लिए खलीफा चुना जाता था, इन लोगों को शीयाने या सिया मुस्लिम कहते हैं |



इस्लाम का नया साल मोहर्रम से शुरू होता है इसलिए, प्रत्येक मुस्लिम भाइयों को सबसे पहले आपस में एक दूसरे को नए साल की मुबारकबाद देनी चाहिए, शिया मुस्लिम लोगों का मानना है कि, अंग्रेजों  का नया साल जनवरी से शुरू होता है, इसलिए जनवरी को नए साल की मुबारकबाद देना गुनाह है, क्योंकि मोहर्रम के महीने से ही शिया मुस्लिम नया साल शुरू होता है |



ताजिया पर किस सुल्तान ने रोक लगा दी थी :


मोहर्रम शिया मुस्लिम एवं पूरे मुस्लिम समुदाय के लिए एक विशेष महत्व रखता है, मुस्लिम समुदाय के लिए मोहर्रम का त्यौहार मातम शोक बनाने वाला एक उत्सव होता है, जिसमें सभी मुसलमानों के साथ- साथ शिया मुस्लिम समुदाय के लोग मोहर्रम के दिन जुलूस के साथ ताजिया लेकर निकलते हैं, और अंत में इस ताजिए को दफना दिया जाता है |


लेकिन क्या आपको पता है कि, ताजिया निकालने को लेकर एक बार, एक सुल्तान ने, इस पर रोक लगा दी थी, नहीं पता तो आज मैं बताता हूं -


निजाम खान लोदी वंश का द्वितीय शासक था | निजाम खान सुल्तान का बचपन का नाम था | वैसे उसका नाम सिकंदर लोदी था, सिकंदर लोदी के पिता का नाम बहलोल खान लोधी था, सिकंदर के पिता की मृत्यु 17 जुलाई 1489 मैं हो गई थी, उसके बाद सिकंदर लोदी सुल्तान की गद्दी पर बैठा |


सिकंदर एक योग्य शासक था, उसने अपने राज्य को बिहार एवं ग्वालियर तक बढ़ा दिया था, सिकंदर लोदी अफगान नवाबों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए सफल हुआ, उसने अपने राज्य की सीमाएं काफी दूर तक फैला दी थी, आगे चलकर सिकंदर लोदी ने 1503  ईसवी में, एक नए शहर की नींव रखी थी, जिसको आज हम आगरा शहर के नाम से जानते हैं |


उसने अपने शासनकाल में अनेकों बदलाव करवाएं थे जैसे कि -


1. सिकंदर ने अपने शासनकाल में अपने आदेश के द्वारा, संस्कृत का एक आयुर्वेदिक ग्रंथ का अनुवाद फारसी में "फरहद-ए-सिकंदरी" में करवाया था |


2. सिकंदर ने मुस्लिम महिलाओं के लिए किसी भी पीर एवं संतो की मजार में जाने पर पाबंदी लगा दी थी |


3. सिकंदर ने सभी मुसलमानों को आदेश देकर मोहर्रम पर ताजिया निकालने की कठोर पाबंदी लगा दी थी |


4. अपने शरीर को सुंदर एवं अपने व्यक्तित्व की सुंदरता को बरकरार रखते हुए, उसने जीवन में कभी भी अपनी दाढ़ी नहीं बढ़ने दी थी |


5. सिकंदर ने अपने नगरकोट पर बनी ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तुड़वा दिया, और उस मूर्ति के टुकड़े को कसाईओ को देकर, मास को तोलने के लिए रखा था |


इसलिए सिकंदर ही एक मात्र ऐसा सुल्तान शासक था, जिसने सभी मुस्लिम लोगों को मोहर्रम के दिन ताजिया निकालने पर रोक लगा दी थी, सिकंदर की मृत्यु सन 1517 ईसवी मैं हो गई थी |


मोहर्रम में काले कपड़े पहनना सही है या नहीं :


मोहर्रम सभी मुस्लिम समुदाय के द्वारा मनाए जाने वाला एक विशेष त्यौहार होता है, मोहर्रम को केवल भारत में ही नहीं बल्कि, जहां-जहां मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं, वहां भी मोहर्रम मनाया जाता है, बहुत से लोग सोचते हैं कि, मोहर्रम के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग काले कपड़े क्यों पहनते हैं, वैसे तो काला कपड़ा पहन कर त्यौहार को मनाना एक अशुभ माना जाता है | 


लेकिन मुस्लिम समुदाय के अनुसार, मोहर्रम एक मातम  मनाने वाला उत्सव होता है, इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग काले कपड़े पहन कर अपने अंदर का दुख सभी लोगों को महसूस कराते हैं |


मौलाना जलाल के अनुसार, काला कपड़ा पहनना "वन की अलामत" है, मोहर्रम के दिन काला कपड़ा केवल शिया मुस्लिम समुदाय के लोग ही नहीं पहनते बल्कि, जो लोग हजरत इमाम हुसैन का शोक मनाते हैं, वह सभी लोग मोहर्रम के दिन काले कपड़े पहनते हैं, उनके अनुसार पूरी दुनिया में हजरत इमाम हुसैन का शोक, मोहर्रम रीति रिवाज के अनुसार मनाया जाता है |


मोहर्रम महीने में शिया समुदाय के लोग 10 दिन बराबर काले कपड़े पहनते हैं, और हजरत इमाम हुसैन का शोक एवं दुख मनाते हैं |


काले कपड़े को अशुभ माना जाता है, इसलिए मोहर्रम को छोड़कर और किसी भी त्यौहार में काले कपड़े नहीं पहने जाते, क्योंकि त्यौहार एक खुशी मनाने का प्रतीक होता है, लेकिन मोहर्रम मातम (दुख) मनाने वाला उत्सव होता है, इसलिए मुसलमानों द्वारा मोहर्रम पर काले कपड़े पहन कर, मनाना कोई गलत बात नहीं है,

काला कपड़ा पहनना मातम के समय गलत नहीं है |


मोहर्रम के दिन क्या पढ़ना चाहिए :


मोहर्रम के दिन सभी मुस्लिम भाइयों को सबसे पहले सुबह सुबह नहा- धोकर पाक जाना चाहिए, और उसके बाद मस्जिदों में जाकर, या फिर अपने घर पर ही नमाज अदा करनी चाहिए, बाद में, कुरान- ए- पाक की तिलावत करना, Nafl पढ़ना, नजर नाज लसाले शबाब करना, आयत पढ़ना और कब्र पर जाकर समूह के साथ कलमा पढ़ना, आदि को करना चाहिए, जिससे मोहम्मद इमाम साहब कि रुह को अल्लाह जन्नत से नवाजे |


निष्कर्ष :


उपरोक्त सभी पंक्तियों से यह निष्कर्ष निकालकर आता है कि, शिया मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा, मोहर्रम को बहुत ही उत्साह के साथ, दुख भरे अंदाज में मातम के रूप में मनाते है, इसलिए मुस्लिम समुदाय में, शिया समुदाय के लोगों का विशेष महत्व होता है |


सिकंदर लोदी के द्वारा, ताजिया पर पाबंदी लगाने लगा दी गई थी, लेकिन आज भारत के किसी भी राज्य में ताजिया के जुलूस को निकालने पर कोई भी प्रतिबंध नहीं है, इसलिए सभी मुस्लिम भाइयों को यह होना चाहिए कि, वह मोहर्रम के त्यौहार को सभी के साथ मिलकर एवं शांति पूर्वक जुलूस निकालते हुए, मोहम्मद साहब की कुर्बानियों को याद करते हुए, मोहर्रम मनाना चाहिए |






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